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ट्रंप का 'टैरिफ वार' और भारत: आर्थिक कूटनीति की अग्निपरीक्षा



पार्टी पॉलिटिक्‍स डेस्‍क, दिल्‍ली। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा वैश्विक आयातों पर 15% का अस्थायी सरचार्ज लगाने की घोषणा ने वैश्विक व्यापार व्यवस्था को हिलाकर रख दिया है। यह कदम अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट द्वारा 'रेसिप्रोकल टैरिफ' को असंवैधानिक घोषित करने के कुछ ही घंटों बाद उठाया गया। भारत के लिए यह देश की व्यापारिक रणनीति, विनिर्माण लक्ष्यों और द्विपक्षीय संबंधों से गहरे जुड़ा मुद्दा है।

प्रभावी शुल्क संरचना का विरोधाभास (The Tariff Paradox)

सतही तौर पर 15% का अतिरिक्त सरचार्ज एक बड़ा बोझ लगता है, लेकिन भारतीय संदर्भ में यह एक प्रकार की 'राहत' साबित हो सकता है।

तुलनात्मक स्थिति: इससे पहले 'रेसिप्रोकल टैरिफ' के तहत भारत पर कई मामलों में 25% से 50% तक के उच्च शुल्क लग रहे थे। अब नए नियमों के तहत एमएफएन (MFN) दर + 15% सरचार्ज मिलाकर भारत के लिए प्रभावी दर औसतन पहले की तुलना में कम हो सकती है (कई रिपोर्टों में इसे 18% या उससे नीचे बताया गया है)। यह भारतीय निर्यातकों के लिए अमेरिकी बाजार में पैठ बढ़ाने की एक रणनीतिक खिड़की खोल सकता है।

सेक्टर-वार प्रभाव: अवसर और चुनौतियां

सेवा क्षेत्र (IT/ BPO): भारतीय आइटी और सेवा निर्यात को इन टैरिफ से छूट मिली हुई है। यह भारत के लिए बड़ी राहत है, क्योंकि अमेरिका इसका सबसे बड़ा सेवा निर्यात गंतव्य है।

फार्मा सेक्टर: दवाओं और फार्मास्युटिकल सामग्री को छूट दी गई है, जो वैश्विक स्वास्थ्य सुरक्षा के साथ भारत के 'जेनेरिक पावरहाउस' की स्थिति को मजबूत करती है।

विनिर्माण (MSMEs): कपड़ा, रत्न, चमड़ा और अन्य विनिर्माण क्षेत्रों में प्रतिस्पर्धा कठिन हो सकती है। भारत को वियतनाम और बांग्लादेश जैसे प्रतिस्पर्धियों के मुकाबले लागत कम करने और दक्षता बढ़ाने का दबाव होगा, क्योंकि वे भी इसी 15% श्रेणी में आते हैं।

व्यापक आर्थिक निहितार्थ (Macroeconomic Implications)

जीडीपी विकास दर: वैश्विक व्यापारिक अवरोधों से भारत की जीडीपी पर कुछ प्रभाव पड़ सकता है, हालांकि बैंक ऑफ बड़ौदा जैसी रिपोर्टों में इसका अनुमानित प्रभाव सीमित (0.2% जैसी गिरावट) बताया गया है। वास्तविक प्रभाव व्यापार समझौते और घरेलू नीतियों पर निर्भर करेगा।

मुद्रास्फीति: यदि भारत जवाबी टैरिफ लगाता है, तो कच्चे माल की आयात लागत बढ़ सकती है, जिससे घरेलू बाजार में महंगाई का दबाव बन सकता है।

कूटनीतिक गतिरोध और अवसर

वाशिंगटन में मुख्य वार्ताकारों की बैठक का स्थगित होना दर्शाता है कि वार्ता की शर्तें बदल चुकी हैं।

अस्थायी प्रकृति: यह सरचार्ज केवल 150 दिनों (जुलाई 2026 तक) के लिए है। भारत के पास इस सीमित समय में अमेरिका के साथ स्थायी ट्रेड डील हासिल करने का दबाव है।

रणनीतिक लाभ: चूंकि यह टैरिफ वैश्विक है (चीन, कनाडा आदि सहित), भारत अपनी 'विश्वसनीय आपूर्ति शृंखला' की छवि का लाभ उठाकर उन अमेरिकी निवेशकों को आकर्षित कर सकता है, जो चीन के विकल्प तलाश रहे हैं।

आगे की राह

भारत के लिए यह समय सक्रिय व्यापार कूटनीति का है। वाणिज्य मंत्रालय को न केवल अमेरिका के साथ मार्च-अप्रैल 2026 की समय सीमा में समझौता सुनिश्चित करना होगा, बल्कि घरेलू निर्यातकों को लॉजिस्टिक्स, सब्सिडी और दक्षता बढ़ाने में सहायता देकर उनकी वैश्विक प्रतिस्पर्धा क्षमता मजबूत करनी होगी। यह 'टैरिफ युद्ध' भारत को विनिर्माण केंद्र के रूप में उभरने का मौका भी दे सकता है, बशर्ते हम चुनौतियों को अवसरों में बदल सकें।

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